गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-27

Gendamal Halwai Ka Chudakkad Kunba-27

रज्जो की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे.. वो अपनी किस्मत और बेबसी पर रो रही थी।

जब काफ़ी देर तक रतन वापिस नहीं आया, तो वो कमरे से बाहर निकल आई और घर के आँगन में आगे बढ़ने लगी, पर रतन का कोई ठिकाना नहीं था।

आख़िर तक हार कर रज्जो अपने कमरे की तरफ जाने लगी, जब वो अपने कमरे की तरफ जा रही थी, उसे एक कमरे से किसी के खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई दी।

‘इतनी रात को इस तरह खिलखिला कर कौन हँस रहा है?’

यह हँसी सुनते ही एक बार रज्जो का माथा ठनका पर रज्जो ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगी।

पर एक बार फिर से उस चहकती हुई आवाज़ ने रज्जो का ध्यान अपनी तरफ खींचा।

इस बार रज्जो से रहा नहीं गया और वो कमरे के दरवाजे पास आकर अन्दर हो रही बातों को सुनने की कोशिश करने लगी।

पर अन्दर जो भी था.. वो बहुत धीमी आवाज़ में बात कर रहा था।
इसलिए अन्दर हो रही वार्तालाप रज्जो की समझ में नहीं आ रही थी।

आख़िर जब कुछ हाथ ना लगा, तो रज्जो अपने कमरे में आ गई.. उसका कमरा ठीक उसी कमरे के बगल में था।

रतन का अब भी कोई ठिकाना नहीं था, रज्जो ने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर बैठ गई।

जब इंसान के पास काम ना हो तो उसका इधर-उधर झाँकना स्वाभाविक हो जाता है.. सुहाग की सेज पर बैठी.. रज्जो तन्हाई के वो लम्हें गुजार रही थी, जिसके बारे में कोई भी नई ब्याही लड़की नहीं सोच सकती थी।

कमरे के अन्दर इधर-उधर झाँकते हुए.. अचानक उसका ध्यान कमरे के उस तरफ वाली दीवार पर गया..जिस तरफ वो कमरा था।

रज्जो ने गौर किया, उस दीवार में काफ़ी ऊपर दीवार में से एक ईंट निकली हुई थी।

ये देखते ही रज्जो से रहा नहीं गया और उसने कमरे में चारों तरफ नज़र दौड़ाई और उसे अपने काम आ सकने वाली एक चीज़ मिल ही गई।

कमरे के उसी तरफ दीवार के एक कोने में एक बड़ी सी मेज लगी हुई थी, जिस पर चढ़ कर दूसरे कमरे में उससे छेद से झाँका जा सकता था।

रज्जो तुरंत खड़ी हो गई और उस मेज को ठीक उस दीवार में बने छेद के नीचे सैट करके ऊपर चढ़ गई और दूसरे तरफ झाँकने लगी।

कुछ ही पलों में उस कमरे का पूरा नज़ारा उसकी आँखों के सामने था और जो उसने देखा, उसे देख कर रज्जो एकदम हक्की-बक्की रह गई, उससे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है।

एक पल के लिए रज्जो के हाथ-पाँव मानो जैसे सुन्न पड़ गए हों।
उसे ऐसा लग रहा था, मानो जैसे उसके पैरों में खड़े रहने की जान ही ना बची हो।

दूसरे कमरे के अन्दर ठीक उसकी आँखों के सामने शोभा का बेटी-बेटा बिस्तर पर एक किनारे पर सो रहे थे और दूसरी तरफ रतन बिस्तर पर नीचे पैर लटका कर बैठा हुआ था।

उसके तन से उसकी धोती गायब थी और उसका 7 इंच लम्बा काले रंग का लण्ड हवा में झटके खा रहा था, पर शोभा उसे दिखाई नहीं दे रही थी।

रतन कमरे के उस कोने की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए.. लगातार अपने लण्ड को मुठिया रहा था, जिससे उसके काले रंग के लण्ड की चमड़ी जब पीछे होती और उसका गुलाबी रंग का सुपारा रज्जो की आँखों के सामने आ जाता।

रज्जो ने उस छेद से उस तरफ देखने की कोशिश की जिस तरफ देखते हुए रतन मुठ्ठ मार रहा था, पर उसे छोटे से छेद से कमरे के उस कोने के तरफ की कोई भी चीज नज़र नहीं आ रही थी।

रज्जो अपनी साँसें थामे हुए.. उस शख्स को देखने का इंतजार कर रही थी, जो उस समय वहाँ मौजूद था और ऊपर से लालटेन की रोशनी भी कम थी।

तभी रज्जो को वो शख्स दिखाई दिया, जिसके बारे में उसके मन में आशंका थी।

शोभा रतन की काकी बड़ी ही मस्तानी चाल के साथ रतन की तरफ बिस्तर की ओर बढ़ रही थी।
उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

शोभा के ब्लाउज के हुक खुले हुए थे और उसकी साड़ी उसके बदन पर नहीं थी, नीचे सिर्फ़ पेटीकोट ही था।

शोभा की 40 साइज़ की बड़ी-बड़ी चूचियाँ ब्लाउज के पल्लों को हटाए हुए बाहर की तरफ हिल रही थीं।

जैसे ही शोभा बिस्तर के पास पहुँची.. वो अपने पैरों पर मूतने वाले अंदाज़ में रतन के सामने नीचे बैठ गई और उसके हाथ को उसके लण्ड से हटा कर खुद उसके लण्ड को पकड़ लिया और उसकी और देखते हुए बोली- आज तो सच में सुबह से मेरी चूत में खुजली और बढ़ गई है.. ये सोच कर कि जिस लण्ड को मैं इतने बरसों से अपनी चूत में ले रही हूँ, वो अब मेरी उस सौत की चूत को चोदेगा.. जिससे तुम ब्याह कर लिया है मेरे लाला..

रतन- क्या काकी.. मैं तो सुहागरात भी तुम्हारे साथ ही मनाऊँगा.. वो साली तो ऐसे चिल्लाने लगी.. जैसे अभी चीख-चीख कर गाँव को इकठ्ठा कर लेगी।

शोभा ने रतन के लण्ड के गुलाबी सुपारे पर अपनी ऊँगलियाँ घुमाते हुए कहा- मैंने तो पहले ही तुझसे कहा था.. वो साली रांड तुझे वो सुख कभी नहीं दे पायगी… जो इतने सालों से मैं तुझे अपनी चूत में तेरा लण्ड डलवा कर देती आई हूँ।

रतन- हाँ काकी.. मैं तो शुरू से ही तुम्हारा गुलाम रहा हूँ, वो तो मेरा दिमाग़ खराब हो गया था, जो उससे शादी कर ली.. देख ना काकी तेरी मस्त चूचियों को देख कर मेरा लौड़ा कैसे तन गया है।

शोभा- हाँ देख रही हूँ मेरे लाला.. मेरी चूत भी तो तेरे लण्ड को देखते ही पानी छोड़ने लगती है। मैं कैसे बर्दाश्त करती.. इस लण्ड को किसी और की चूत में घुसता देख कर… जिससे मैंने रोज मालिश करके इतना तगड़ा बनाया है.. याद है जब तूने मुझे पहली बार चोदा था.. तब तू इतना छोटा था कि सारा दिन तेरी नाक बहती रहती थी।

रतन ने धीमे स्वर में हँसते हुए कहा- हाँ काकी.. खूब याद है, तुमने ही तो मुझे चोदना सिखाया था।

शोभा ने नखरे से मुसकराते हुए कहा- चल हट बदमाश.. तूने ही तो उस उम्र में भी मेरी चूत की आग बढ़ा दी थी।

रतन- वो काकी.. तब तो मैं नादान था। वो तो मुझे पता भी नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूँ।

शोभा- अच्छा छोड़ ये सब.. आज कितने दिनों बाद मेरी चूत और जीभ तेरे लण्ड का स्वाद चखने वाली है… खाली गप्पें लगा कर वक्त बर्बाद ना कर मेरे लाल.. मेरे भोसड़ी में आग लगी हुई है, अब तो मुझे ये तेरा लौड़ा अपनी चूत में लेने दे।

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यह कहते हुए शोभा ने झुक कर रतन के लण्ड के सुपारे पर अपनी जीभ बाहर निकाल कर उसकी ओर देखते हुए.. चारों तरफ से चाटने लगी।

रतन ने पलक झपकते ही.. शोभा के बालों को कस कर पकड़ लिया।

‘आह चूस साली रांड.. ओह बहुत अच्छा चूसती है तू.. ओह साली दिल करता है… दिन-रात तेरी चूत और मुँह में लौड़ा पेलता रहूँ।’

शोभा ने रतन की ओर बनावटी गुस्से से देखते हुए कहा- धीरे.. बच्चे सो रहे हैं.. कहीं देख लिया तो?

रतन ने शोभा के सर को पकड़ कर अपने लण्ड पर झुकाते हुए कहा- तू चूस ना साली… मुझे पता है, जब तक तू मेरे साथ है, कोई बहन का लौड़ा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।

शोभा ने एक बार रतन की ओर देखा फिर अपने बच्चों की तरफ देखा और फिर अपने होंठों को खोल कर रतन के लण्ड के सुपारे को मुँह में ले लिया।
रतन की आँखें मस्ती में बंद हो गईं।

ये नज़ारा देख कर रज्जो एकदम से हैरान रह गई।
उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि आख़िर उसके साथ हो क्या रहा है।
उसकी आँखों से आँसू सूखने का नाम नहीं ले रहे थे, पर अब उसे भी अपनी चूत की बीच नमी महसूस होने लगी थी।

उधर शोभा रतन के लण्ड को मुँह के अन्दर-बाहर करते हुए चूस रही थी और रतन अपने एक हाथ से उसकी चूचियों को मसल रहा था। बीच-बीच में शोभा अपनी जीभ की नोक से उसके लण्ड के पेशाब वाले छेद को कुरेद देती और रतन एकदम से मचल उठता।

तभी उसने शोभा को उसके कंधों से पकड़ कर ऊपर उठा लिया।
जैसे ही शोभा सीधी खड़ी हुई.. रतन ने उसके पेटीकोट के नाड़े को पकड़ कर खींच दिया।

इससे पहले के शोभा का पेटीकोट सरक कर नीचे गिरता.. शोभा ने उससे लपक कर थाम लिया।

‘आह्ह.. क्या कर रहे हो..? इसे क्यों खोल रहे हो, अगर बच्चे उठ गए और मुझे इस हालत में देख लिया तो..?’ शोभा ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा।

रतन ने शोभा के हाथों से उसके पेटीकोट को छुड़ाते हुए कहा- काकी जब तक तुझे नंगा करके नहीं चोद लेता.. मेरा लण्ड नहीं झड़ता.. तुम्हें तो मालूम है।

ये कहते ही, रतन ने अपनी काकी शोभा का पेटीकोट को पकड़ कर नीचे सरका दिया..
अब शोभा के बदन सिर्फ़ एक ब्लाउज रह गया था, वो भी आगे से पूरा खुला हुआ था।

जैसे ही शोभा के बदन से पेटीकोट अलग हुआ.. रतन ने अपने हाथों को पीछे ले जाकर शोभा की मांसल गाण्ड को अपने हाथों में भर कर मसलना चालू कर दिया।

शोभा की आँखें मस्ती में बंद हो गईं, उसके पूरे बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई। रतन दोनों पैरों को लटका कर बिस्तर के किनारे बैठा हुआ था।

शोभा रतन से लिपटे हुए.. अपने दोनों पैरों को रतन के दोनों तरफ बिस्तर के किनारों पर रख कर उकड़ू होकर बैठ गई।

उसने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर रतन के लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर रखा और धीरे-धीरे अपनी चूत को रतन के लण्ड के सुपारे पर दबाने लगी।

रतन का लण्ड फिसलता हुआ शोभा की चूत की गहराईयों में घुसने लगा। जैसे ही रतन का पूरा लण्ड शोभा की चूत की गहराईयों में समाया, शोभा ने अपनी बाँहों को रतन की पीठ पर कस लिया और अपनी गाण्ड को ऊपर-नीचे उछाल कर रतन के लण्ड से चुदवाने लगी।

शोभा ने पूरी रफ़्तार से अपनी चूत को रतन के लण्ड पर पटकते हुए सीत्कार भरी, ‘आह ह.. हाँ बेटा.. मसल मेरी गाण्ड को.. ओह तेरे लण्ड के बिना नहीं रह सकती.. ओह ओह्ह और ज़ोर से चोद अपनी काकी को.. ओह्ह माआआ मर गई ओह्ह आह्ह.. आह्ह..’

रतन के दोनों हाथ शोभा के मांसल चूतड़ों को ज़ोर-ज़ोर से मसल रहे थे। उधर दूसरे कमरे में खड़ी रज्जो की हालत ये नज़ारा देख कर खराब हुई जा रही थी और दूसरे कमरे में चुदाई का खेल अपने जोरों पर था।

आख़िर रज्जो कब तक ये सब सहन करती.. उसका पति उसके सामने ही अपनी काकी को चोद रहा है।

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एक लम्बी कथा जारी है



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