मैं सुहासिनी हूँ

(Mai Suhasini Hun)

मेरा नाम सुहासिनी है और मैंने इंग्लिश से एम ए किया है, मैं दिल्ली में रहती हूँ। मेरे पति कारोबारी हैं और वो कोयले की खदानों में से कोयला खरीद कर आगे बेचने का काम करते हैं और इसी सिलसिले में कई बार घर से बाहर रहते हैं।

एक दिन मैंने इन्टरनेट पर जब uralstroygroup.ru.xzy पर उत्तेजक कहानियाँ देखी तो मैंने सोचा कि मुझे भी अपनी सच्ची घटना प्रस्तुत करनी चाहिए।

बात उन दिनों की है जब मेरी शादी को दो वर्ष होने वाले थे पर मुझे संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो पा रही थी। मेरे सास ससुर और पतिदेव सभी बेताबी से संतान का इंतज़ार कर रहे थे। हालाँकि बात उतनी भी नहीं बिगड़ी थी परन्तु फिर भी दबी जुबान से मेरे सास-ससुर इस इच्छा को जाहिर कर ही देते थे।

मैंने उनकी इच्छाओं का सम्मान करते हुए खुद को डॉक्टर को दिखाना उचित समझा और खुद ही एक दिन अकेले बिना बताये डॉक्टर को दिखाने चली गई। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिख दिए और तीन दिन बाद फिर से आने के लिए कहा।

मैं तीन दिन बाद फिर से बिना बताये किसी काम का बहाना बना कर घर से निकली और डॉक्टर के क्लिनिक पर पहुँची।

वहाँ पर डॉक्टर ने बताया कि मेरी रिपोर्ट्स बिलकुल ठीक हैं, उनमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं नज़र आती।

जब मैंने उनसे संतान न होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया- आपके पति के भी कुछ टेस्ट करने होंगे।

मेरे पति उन दिनों घर से बाहर थे और अगले हफ्ते आने वाले थे। उनके आने पर मैंने उनसे इस विषय में बात की और वो भी टेस्ट कराने के लिए राजी हो गए।

मैं अगले दिन उन्हें भी अपने साथ लेकर क्लिनिक पहुँची और डॉक्टर ने उनके टेस्ट करने के बाद तीन दिन बाद आने के लिए कहा। मेरे पति सिर्फ दो ही दिन के लिए आये थे तो उन्होंने मुझे बोला- तुम ही रिपोर्ट्स ले आना।

3 दिन बाद जब मैं अपने पति क़ी रिपोर्ट्स लेने पहुँची तो यह सुन कर मेरे पैरों के नीचे से धरती खिसक गई क़ि मेरे पति मुझे संतान दे पाने में असमर्थ हैं।

मैं इतनी बेचैन अपनी जिंदगी में कभी नहीं हुई थी और न जाने मेरा दिमाग उस समय क्या क्या सोचने लग गया था।

मुझे पता था क़ि यह समाज ऐसे विषय में हमेशा नारी को ही दुत्कारता है। हालाँकि हो सकता है क़ि कृत्रिम तरीके से में गर्भाधान करा कर सफल हो जाऊँ परन्तु जब मेरे पति को पता चलेगा क़ि उनमे शारीरिक कमी है तो वो अंदर से टूट जायेंगे और मैं उनसे बहुत प्रेम करती हू क्यूँकि वे बेहद ही अच्छे स्वाभाव के इंसान हैं और मुझे किसी बात पर नहीं रोकते।

यह ही सब सोचते सोचते न जाने कब मैं मेट्रो स्टेशन तक आ गई, मुझे पता ही नहीं चला। उसी आप-धापी में मैंने एक ऐसा कदम उठा लिया जिसका मुझे आज तक नहीं पता चल रहा क़ि मैंने वो ठीक किया या नहीं।

संतान सुख क़ी चाहत और अपने पति को दोषी न बता पाने की कोशिश में मैंने एक ऐसा तरीका सोचा क़ि जिसका थोड़ा सा दुःख तो मुझे आज भी होता है पर मैं खुद को हालात के आगे मजबूर पाती हूँ।

दिल्ली में ही मेरे पति के एक दोस्त नवीन भी रहते थे। वे काफी आकर्षक शख्सियत के मालिक थे और मेरी शादी वाले दिन भी बारात में सबसे ज्यादा सुन्दर और मोहक वो ही लग रहे थे। शादी के बाद भी एक ही शहर में होने के कारण उनका हमारे घर पर आना जाना था परन्तु वे कभी भी मेरे पति के पीछे से नहीं आये और उनकी नियत में मुझे कभी भी खोट नज़र नहीं आया।

हालाँकि एक नारी होने के नाते मेरा दिल कई बार उनके बारे में सोचता रहता था पर मैंने कभी भी अपनी हसरतों को पूरा करने का प्रयत्न नहीं किया।

परन्तु न जाने आज क्या सोचते हुए मैंने उनके पास फ़ोन मिला दिया और बोली- मैं किसी काम से डॉक्टर के पास आई हुई थी और अचानक से तबीयत बिगड़ने के कारण घर तक नहीं जा सकती, तो क्या तुम मुझे लेने आ सकते हो।

उन्होंने अपने स्वीकृति दे दी और 5 मिनट बाद ही मुझे मेट्रो स्टेशन पर लेने आ गए। गाड़ी में बैठने के बाद उन्होंने घर छोड़ने की बात कही तो मैंने बहाना बनाते हुए कहा- मैंने कभी तुम्हारा घर भी नहीं देखा है और मेरी तबियत भी कुछ ठीक नहीं है तो आज तुम मुझे अपने घर पर ले चलो।

उनका स्वाभाव थोड़ा सा शर्मीला होने के कारण वे एक बार तो हिचके पर जल्दी ही मान गए। वो घर पर अकेले ही रहते थे क्यूंकि उनका विवाह नहीं हुआ था और उनका अपना घर दूसरे राज्य में था। घर पर पहुँच कर उन्होंने मुझे बिठाया और चाय बनाने लग गए।

वो जब चाय ले कर आये तो मैंने कांपते हाथो से चाय खुद पर गिरा ली और उनसे बाथरूम का रास्ता पूछा। बाथरूम में पहुँच कर मैंने अपनी साड़ी उतार दी और केवल ब्रा और अंडरवीयर में रहकर साड़ी पर वहाँ साबुन लगाने लगी जहाँ चाय गिरी थी। परन्तु मेरे दिमाग में तो कुछ और ही दौड़ रहा था, मैं बेहोशी का बहाना बनाते हुए चीखी और धड़ाम से बाथरूम के फर्श पर गिर गई।

नवीन दौड़ता हुआ आया और मुझे इस हालत में देख कर एक बार तो शरमा गया पर जल्दी ही उसने किसी खतरे का अंदेशा होने पर मुझे अपनी बाहों में उठाया और पलंग पर लिटा दिया। उसने मेरे गालो को थपथपाते हुए मेरा नाम ले कर मुझे पुकारा जैसे क़ि होश में लाने क़ी कोशिश कर रहा हो।

मैंने भी थोड़ा सा होश में आने का नाटक करते हुए उसे बोला- अब मैं ठीक हूँ, मुझे थोड़े आराम क़ी जरुरत है।

मैंने कहा- मेरे लिए डॉक्टर को बुलाने की जरुरत नहीं है। यह कह कर मैं सोने का नाटक करने लगी।

जैसा क़ि मुझे अंदाजा था, नवीन मुझे इस रूप में देख कर उत्तेजित हो गया था, हो भी क्यों न, मेरे वक्ष के उभार मेरी पारदर्शी ब्रा में से साफ़ दिख रहे थे और मेरे शरीर क़ी बनावट तो जो सितम ढा सकती है उसका तो मुझे पता ही था।

वो बाथरूम में गया और हस्तमैथुन करने लगा। मैं भी उसके पीछे से बाथरूम में आ गई।

उसने दरवाजा खुला छोड़ रखा था क्यूंकि उसे लग रहा था कि मैं तो नींद में हूँ। मैंने बाथरूम में घुसते ही एक नज़र उसके लिंग पर डाली। उसका सुडोल लिंग देख कर मैं उतेज्जना से भर गई पर जल्द ही खुद को सँभालते हुए नवीन से बोली- नवीन, मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं माँगा पर आज तुम्हें मुझे अपने दोस्त की ख़ुशी के लिए कुछ देना होगा।

नवीन जो बेहद घबरा गया था, बोला- सुहासिनी, मैं तुम्हारी बात समझा नहीं?

तो मैंने उसे रिपोर्ट्स के बारे में सब बता दिया और उसे विश्वास दिलाया क़ि अगर हम सम्भोग करते हैं तो इसमें बुरा कुछ नहीं होगा क्यूंकि हम यह काम मेरे पति की भलाई के लिए करेंगे।

जल्दी ही उत्तेजना से भरा नवीन सहमत हो गया और बोला- सुहासिनी, जो कुछ भी करना है तुम ही कर लो, मैं तुम्हारा साथ दूँगा पर खुद कोई पहल नही करूँगा।

उसकी स्वीकृति पाते ही मैं उल्लास से भर गई परन्तु उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया। मैं उसे हाथ पकड़ कर बेडरूम में ले आई और धीरे धीरे अंडरवीयर को छोड़ कर उसके सारे वस्त्र उतार दिए।

फिर मैंने अपनी ब्रा खोल दी और अपने उरोजों को कैद से मुक्त कर दिया। मेरे वक्ष क़ी पूरी झलक पा कर नवीन की आँखें फटी क़ी फटी रह गई और उसकी उत्तेजना के बढ़े हुए स्तर को मैंने उसके अंडरवीयर में से झांकते कड़े लिंग को देख कर महसूस किया। मैंने हौले से उसके हाथों को पकड़ कर अपने उरोजों पर रख दिया और उसने एक लम्बी गहरी सिसकी ली जैसे क़ि उसका हाथ किसी गरम तवे से छू गया हो।

मैंने उसे बेबस पाते हुए अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए और खुद को उसके ऊपर गिरा दिया। मेरे वक्ष उसके सीने में गड़े जा रहे थे और मैं उसकी बढ़ी हुई धड़कनों को महसूस कर सकती थी।

जल्दी ही उसे न जाने क्या हुआ और उसने अचानक से मुझे नीचे गिराते हुए पूरी उत्तेजना में मुझे चूमना शुरू कर दिया और अपने दोनों हाथों से मेरे स्तनों को मसलने लगा। मुझे भी ऐसा आनन्द पहली बार मिला था और मैं भी उसके होंठों को अपने होंठों से और जोर से कसने लगी।

मैंने उसका एक हाथ पकड़ कर अपनी कच्छी में डाल दिया जो पहले ही मेरी उत्तेजना के कारण गीली हो गई थी।

कुछ देर तक मेरे होंठों और कबूतरों को चूमने के बाद नवीन ने अपना मुँह मेरी पैंटी पर बाहर से लगा दिया। मेरे योनि रस की खुशबू ने आग में घी का काम किया और उसने दोनों हाथों से मेरी अंडरवीयर को फाड़ दिया और बुरे तरीके से मेरी योनि को चाटने लगा।

यह कहानी आप uralstroygroup.ru में पढ़ रहें हैं।

यह सब करते हुए वो एक जंगली भैंसे जैसा लग रहा था, हो भी क्यों न, क्यूंकि वो बेहद शर्मीला था और उसकी कोई दोस्त भी नहीं थी। शायद पहली बार उसने एक जवान नारी के नंगे बदन को हाथ लगाया था।

उसकी तेज सांसें मेरी योनि से टकरा रही थी और मेरी उत्तेजना को और भी बढ़ा रही थी। मैंने किसी तरह उसकी पकड़ से खुद को आजाद करते हुए उसे दूर धकेला और उसके कच्छे को उतार दिया और उसके पूरे सख्त हो चुके सुडोल लिंग को अपने मुँह में डाल लिया।

मेरा ऐसा करते ही वो एक बार हिचका और मुझे दूर करने लगा, मैंने उसे अपनी आँखों से शांत होने का इशारा किया और दोबारा से उसके लिंग को मुँह में डाल लिया और उसे चूसने लगी।

2 ही मिनट में उसके शरीर के हावभाव बदल गए और वो कसमसाने लगा। ये देख कर मैंने उसका लिंग मुह से बाहर निकाल लिया और हाथों से जोर जोर से हिलाने लगी। मैंने उसके लिंग को कुछ ही बार हिलाया था क़ि जैसे एक भूचाल सा आ गया हो, वो आपे से बाहर सा हो गया और उसी के साथ उसके लिंग ने मुझ पर जैसे वीर्य की बारिश सी कर दी।

मेरा पूरा बदन उसके वीर्य से नहा गया था। स्खलित होने के बाद वो कुछ निढाल सा हो गया परन्तु मैंने उसे कहा- अब मुझे साफ़ तो कर दो।

मैं उसे अपने साथ बाथरूम में ले गई और उसे खुद को साबुन से साफ़ करने के लिए कहा।

उसने साबुन उठाया और मेरे बदन पर मलने लगा। पूरे शरीर पर साबुन लगाने के बाद वो मेरे पीछे खड़ा हो गया और अपने दोनों हाथों से मेरे उरोजों और योनि को मसलने लगा। वो मुझ से सट कर खड़ा था और साबुन मसल रहा था।

कुछ ही मिनट में मैंने अपने नितम्बों पर उसके फिर से कड़े हो चुके लिंग क़ी दबिश महसूस क़ी। मैं उसकी तरफ मुड़ी और उसके लिंग को देख कर मुस्कुरा कर बोली- चलो, काम पूरा करते हैं।

हम दोनों ने एक दूसरे को तौलिये से पौंछा और फिर से बेडरूम में चले गए। इस बार मैंने उसे नीचे लिटा दिया और उसके लिंग पर बैठने लगी पर उसका मोटा लिंग जैसे अंदर जाने को तैयार ही नहीं था।

मैंने उससे कहा- मेरी फ़ुद्दी को चिकनाई की जरुरत है !

और यह कहते हुए मैं उसके चेहरे पर बैठ गई। अब मेरी चूत उसके मुँह के बिल्कुल ऊपर थी और उसकी जीभ मेरी योनि को बुरी तरह से टटोल रही थी। उसकी गरम जीभ से मेरी योनि में और अधिक पानी छोड़ने लगी जिसे वो एक भंवरे क़ी तरह मदहोश सा चाट रहा था।

काफी देर हो जाने पर मैं उसके मुँह पर से उठी और फिर से उसके लण्ड पर बैठने की कोशिश करने लगी। इस बार काम बन तो गया पर फिर भी उसका लम्बा लिंग पूरी तरह से अंदर नहीं जा पा रहा था और मेरी चूत में उसके लम्बे लिंग की वजह से मीठा मीठा दर्द भी हो रहा था।

फिर भी मैंने उत्तेजना के कारण कोशिश क़ी और थोड़ी सी कोशिश के बाद उसका पूरा लिंग मेरी योनि में समा गया। मैं उसके लिंग पर बैठ कर कूदने लगी और कुछ ही देर में उत्तेजना के कारन स्खलित हो गई परन्तु उसका लिंग तो इस बार जैसे हार मानने के लिए तैयार ही नहीं था।

मेरे स्खालित होते ही उसने मुझे बाहों में उठा लिया और अपने लिंग को मेरे उरोजों के बीच में रख कर मसलने लगा। मैंने भी इस काम में उसका साथ दिया और अपने वक्षों से उसके लिंग को सहलाने लगी।

कुछ ही मिनट बाद मैं फिर से तैयार हो गई और बेड के सिरहाने झुक गई। उसने पीछे से आकर मेरी योनि में अपना लिंग डाला और हाथों से मेरी कमर को पकड़ कर जोर जोर से झटके मारने लगा। उसके मोटे लिंग की रगड़ से मेरी योनि में हल्के दर्द के साथ मजा बढ़ता जा रहा था और में कुलमुला रही थी।

करीब 5 मिनट तक झटके मारने के बाद वो भी स्खलित हो गया और मेरी योनि उसके गरम वीर्य से भर गई।

मैं बहुत खुश थी क्यूंकि एक तो मुझे संतान सुख की प्राप्ति हो सकेगी और दूसरा इतना मजा मुझे शायद ही कभी आया हो।

नवीन भी स्खलित होने के बाद निढाल सा गिर गया।

मैं जल्दी से उठी और बाथरूम में जाकर अपनी साड़ी पहन ली और जाते वक़्त जब अपनी फटी हुई अंडरवीयर ले जाने लगी तो नवीन ने कहा- सुहासिनी, इसे तो तुम मेरे पास ही रहने दो क्यूंकि मैं इस सुगंध का दीवाना हो गया हूँ।

मैंने अपनी अंडरवीयर उसे देते हुए बाय बोला और रिक्शा पकड़ कर मेट्रो स्टेशन पहुँच गई।

मेट्रो पकड़ कर जब मैं घर पहुँची तो मुझे एहसास हुआ क़ि क्या मैं किसी और क़ी संतान को माँ का सुख दे पाऊँगी। यह सोच कर मैं ग्लानि से भर गई और मैंने फैसला किया क़ि यह तरीका गलत है और मैंने गर्भनिरोधक दवा खा ली और कुछ दिन और सोच कर निर्णय लेने का फैसला लिया।

पर इसे मेरी बदकिस्मती कहिये या खुशकिस्मती। उस दिन के बाद से नवीन किसी न किसी बहाने से मेरे घर पर आता ही रहता है और मुझे भी उसके साथ सम्भोग करके चरम सुख क़ी प्राप्ति होती है।



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