मिल-बाँट कर..-4

(Mil Bant Kar-4)

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प्रेषक : सुशील कुमार शर्मा

अब मेरे पास कृत्रिम रूप से अपनी जवानी की आग को शांत करने के अलावा और कोई दूसरा साधन न था। मैं छुप-छुपकर कृत्रिम साधनों से अपनी कामाग्नि को शांत करने की कोशिश करती। योनि में कभी लम्बे वाले बैंगन डाल कर अपनी कामाग्नि को शांत करती तो कभी आधी-आधी रात को उठकर नहाती तब कहीं जाकर मेरी आग ठंडी पड़ती। कई बार मन में गंदे-गंदे ख्याल आते-जाते रहते। सोचती थी कि जो लोग मुझ पर बुरी नज़र डालते हैं उन्हीं से अपनी जवानी मसलवा लूँ। पर यह करना भी मेरे वश की बात न थी। तुम्हारे चाचा जी की इज्जत का ख्याल मन में आते ही मेरा मन अपने आप को कोसने लगता।”

जब कभी तुम्हारे चाचाजी बाहर गए होते तो मेरे ये दोनों बच्चे मेरे ही पास मुझसे चिपटकर सोते थे। वह भी एक भयानक रात थी। चाचा तुम्हारे किसी काम से बाहर गए थे। बाहर आंधी-तूफ़ान का माहौल था। दोनों बच्चे, झंडे और ठन्डे मुझसे चिपटकर सो रहे थे। हालांकि झंडे और ठन्डे अब दोनों ही सोलह-सोलह साल के हो चले थे, फिर भी मेरे लिए तो बच्चे ही थे। अचानक से बादल बड़ी जोरों से गरजे और फिर मूसलाधार बारिश होने लगी। झंडे मेरे सीने से चिपट कर सो रहा था। ठन्डे मेरी पीठ की ओर था।

इसी बीच मुझे लगा कि कोई चीज मेरी जाघों से सट रही है। मैंने हाथ से टटोलकर देखा तो मेरा हाथ झंडे के लिंग से जा टकराया। झंडे का लिंग एकदम किसी जवान आदमी का सा महसूस हुआ मुझे। क्योंकि तुम्हारे चाचा जी का लिंग भी कभी माह, दो माह में खड़ा होता हुआ मैंने देखा था। मेरी नीयत में खोट आ गया। मैंने उठकर लाइट जला दी और गौर से झंडे के लिंग में होती हुई हरकतों को देखने लगी। अब मेरा मन झंडे के लिंग से खेलने को मचलने लगा। कहते है कि घर पर खीर रखी हो तो कोई भूखे पेट क्यों सोये। मैंने झट से लाइट बुझा दी और झंडे को अपने सीने से सटाकर लेट गई।

धीरे-धीरे मैंने अपना हाथ ले जा कर झंडे के लिंग पर रख दिया और उस पर हाथ का दबाव डालने लगी। झंडे का लिंग फूल कर मोटा हो गया। मैंने झट से हाथ हटा लिया। झंडे सो रहा था लेकिन मेरे दिल की ख्वाइश अधूरी थी। मेरा ध्यान उसी के लिंग में पड़ा था। इसी बीच मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने अँधेरे में ही झंडे का हाथ खींच कर अपने वक्ष पर रख लिया और अपनी साड़ी कुछ ऊपर को चढ़ा ली। साड़ी इस तरह से ऊपर उठाई थी कि मेरी जांघें और योनि का कुछ भाग भी चमकता रहे।

झंडे को मैंने धीरे से उठाया और कहा,”झंडे, उठ तो बेटा मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है। थोड़ी सी बाम मसल दे मेरे माथे पर..”

झंडे उठ बैठा और बोला,”बाम कहाँ रखी है चाची…?”

“लाइट जला कर देख ले बेटा।”

झंडे उठा और उसने लाइट ऑन कर दी। मैं अनजान सी बनी चुपचाप लेटी रही। बहुत देर तक झंडे बाम खोजता रहा पर उसे बाम ढूँढ़ने में इतनी देर क्यों लग रही थी ये बात मैं भली-भांति समझ सकती थी।

“लाइट बंद करदूं चाची?”

शायद झंडे को बाम मिल गई थी।

“हाँ, बंद कर दे, और बाम रगड़ दे मेरे माथे पर…”

झंडे के कोमल, जवान हाथ मेरे माथे को रगड़ते हुए मेरे मन में गुदगुदी पैदा कर रहे थे। मन में नए-नए ख़याल आ-जा रहे थे। मैं अपना तन-मन सब कुछ झंडे पर न्यौछावर करने को तैयार बैठी थी। बस इन्तजार था तो उसकी पहल का। बड़ा ही ढीठ लड़का है, बुद्दू कहीं का..। एक जवान औरत क्या चाहती है, मूर्ख इतना भी नहीं जानता।

कुछ देर बाद जब वह माथे पर बाम रगड़ चुका तो मैंने कहा,”झंडे, मेरे बच्चे, जरा सी बाम मेरे सीने पर भी मल दे। सांस लेने में भी परेशानी हो रही है…”

झंडे थोड़ा सा नीचे खिसक आया और उसने मेरे सीने पर भी बाम रगड़ना शुरू कर दिया। उसके हाथ मेरे छातियों को छूते हुए मेरे पेट तक पहुँच रहे थे। मुझे जाने कितना सुकून मिल रहा था कह नहीं सकती। झंडे ही तो था मेरी चढ़ती, उफनती जवानी में कदम रखने वाला पहला मर्द जिसने मेरी जिन्दगी के आईने में रंग भर दिए।

“बेटा, मेरे पैर और टांगें भी दबा दे। कमर से नीचे के हिस्से में बहुत ही दर्द हो रहा है, तुझे नीद तो नहीं आ रही?”

“नहीं।” कह कर झंडे ने मेरी टांगों को दबाना शुरू कर दिया। न जाने किस मिट्टी का बना था मरदूद कि जरा भी हाथ नहीं बहका रहा। मुझे मन ही मन उस पर क्रोध आ रहा था। गाड़ी को पटरी पर ला ही नहीं रहा।

“अब मेरी जांघें सहला दे, जरा हल्के-हल्के से। जोरों से मत रगड़ना ..”

झंडे हल्के हाथों से मेरी दोनों जांघें सहलाने लगा। मेरी योनि के बाल उसके हाथ से टकरा रहे थे। इस बार मैंने महसूस किया कि लौड़ा बहकने लग गया था। बार-बार उसके हाथ मेरी जाँघों के बीच की घाटी की गहराई नापने लगते।

“हाँ, ऐसे ही बेटा, बड़ा ही आराम मिल रहा है….”

मेरा इशारा शायद उसने समझ लिया था। उसने अब मेरी योनि के बालों से खेलना शुरू कर दिया था।

“जोरों की खुजली हो रही है इन बालों में ! बेटा जरा कड़े हाथ से खुजा दे इनको…। ”

“चाची !”

“क्या है?” मैंने पूछा।

तो वह बोला,”कहो तो इन बालों को मैं साफ़ कर दूं ?”

“इतनी रात गए? ठन्डे पास ही सो रहा है..जाग गया तो?”

“तो चलो बाथरूम में चलें….”

“चल बेटा, तू कहता है तो…”

झंडे और मैं दोनों बाथरूम में आ गए। बाथरूम काफी बड़ा था, जिसमें मैं अपनी दोनों जांघें चौड़ी करके लेट गई और झंडे मेरी योनि के बाल बनाने लगा।

मैंने पूछा,”झंडे, तुझे कहीं शर्म तो नहीं आ रही मुझे नंगा देख कर…?”

“क्यों, शर्म कैसी, तुम तो मेरी माँ समान हो…”

“अच्छा तू बता, तेरे बाल अभी आये हैं या नहीं…?”

“हैं चाची, पर अभी तुम्हारे बालों की तरह घने, काले नहीं हैं…”

“दिखा तो मुझे भी ! देखें, तेरे बाल कैसे हैं?”

झंडे ने शरमाते हुए अपने पजामे का नाड़ा खोल दिया। मैंने उसके पजामे को नीचे खिसका दिया। वाह, क्या लिंग था झंडे का, मोटा, तना हुआ, ऐसे लहरा रहा था मानो कोई मोटा सांप सपेरे की टोकरी से भाग कर यहाँ आ छुपा हो। मुझे तो थी ही लिंग की भूख, मैंने आव देखा न ताव, झट से झंडे के उफनते लिंग को अपनी मुट्ठी में भर लिया और उसे प्यार से सहलाने लगी। मेरे बाल झंडे साफ़ कर चुका था।

मैंने उसके कानो में फुसफुसाकर कहा,”अब चल, चलकर सोते हैं।”

फिर झंडे और मैं दोनों लोग वापस आकर अपने बिस्तर पर सो गए। लाइट बुझा दी थी। मैंने झंडे के कान में कहा, “झंडे, बेटा तू अपने चाचा से तो नहीं कहेगा कि मैंने तुझसे अपने बाल साफ़ करवाए थे..। देख बेटा, तेरे चाचा मार डालेंगे मुझे…।”

“नहीं चाची, तुम्हारी कोई गलती नहीं है। मेरा भी तो मन कर रहा था तुम्हारी योनि देखने का !”

मैंने पूछा,”अब तो देख ली ना?”

“हाँ,” झंडे बोला।

“कैसी लगी तुझे?” मैंने पूछा।

तो उसने बताया कि आज उसे बड़ा ही अच्छा लगा।

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“अच्छा, एक बात बता, तूने कभी किसी लड़की की योनि देखी है?”

“अभी तक तो नहीं देखी…” वह बोला, आज पहली बार मैंने तुम्हारी ही देखी है चाची।”

“मेरी योनि के बाल साफ़ करने का विचार तेरे मन में क्यों आया भला…?”

“ऐसे ही..। जब तुमने मुझसे बाम मसलवाई थी तो मैंने तुम्हारी योनि देख ली थी। बस यूँ ही दिल चाहने लगा….”

“अगर तेरा मन करने लगा कि आज चाची के साथ वो सब कर डालूं जो एक पति अपनी पत्नी के साथ करता है तो तू कर डालेगा..?”

झंडे घबरा गया, बोला,”नहीं चाची, ऐसा क्यों करने लगा मैं…”

“ठीक है, चल अब एक खेल खेलते हैं, तू मेरी योनि में अपनी उंगली डाल कर मेरी योनि को सहलाएगा और मैं तेरा लिंग सहलाती हूँ, कैसा रहेगा यह खेल…?”

झंडे बोला,” ठीक रहेगा, इधर नींद भी कहाँ आ रही है।”

और फिर झंडे ने मेरी योनि में अपनी उंगली करना शुरू कर दिया। मैं भी उसके लिंग को अपनी मुट्ठी में भर धीरे-धीरे सहला रही थी। कुछ देर के बाद मैंने उससे कहा,”झंडे, कुछ मज़ा नहीं आ रहा। ऐसा करते हैं कि तू मेरी योनि को चाटे और मैं तेरे लिंग को अपने मुँह में भरकर चूंसुंगी। सच बड़ा ही मज़ा आएगा ऐसा करने में।”

झंडे ने पूछा,”क्या तुम और चाचा ऐसा ही करते हो?”

मैं उसकी बात पर चिहुक उठी,”तेरे चाचा में अगर इतना ही दम होता तो मैं क्यों तड़पती तेरे लिंग के लिए…”

झंडे ने बड़े ही भोलेपन से पूछा,”चाची, आप सचमुच तड़पती हो ऐसा करने के लिए?”

“और नहीं तो क्या, जरा सोच, मैं ब्याह के बाद भी आज तक कुँवारी हूँ। तेरे चाचा में इतनी ताक़त नहीं कि अपना लिंग मेरे अन्दर डाल सकें..”

“सच चाची? तब तो मैं आपकी मदद जरूर करूंगा, पर एक बात बताओ चाची, तुम्हारे संग ऐसा काम करना पाप तो नहीं होगा?”

मैंने कहा,”अरे पगले, पाप तो जब है कि हम किसी को कोई कष्ट पहुंचाएं। मुझे तो तुझसे करवाने में मज़ा मिलेगा। देख, अगर तू मुझे खुश रखेगा तो बात घर की घर में ही रहेगी और जरा सोच यही काम मैं बाहर करवाती फिरूँ तो तेरे चाचा की कितनी बदनामी होगी।”

“ठीक है चाची, मैं तैयार हूँ….” तब मैंने झंडे को अपने सीने से लगाकर जोरों से भींच लिया। फिर मैंने उसके उत्थनित लिंग को पकड़ कर अपने योनि-द्वार पर टिका दिया और उसके कानों में धीमे से फुसफुसाई,”झंडे, अपना लिंग मेरी योनि के अन्दर घुसाने की कोशिश कर…!”

मैं भी अपने चूतड़ों को आगे-पीछे धकेल कर झंडे का लिंग अपनी योनि के अंदर गपकने की चेष्टा कर रही थी। मेरी अनछुई योनि उत्तेजना वश अब पानी छोड़ने लगी थी। मैंने झंडे के चूतड़ों को कस कर अपनी ओर खींचा और अपनी ओर से भी एक जोरदार धक्का मारा।

इस बार की मेहनत सफल हो गई। झंडे का फनफनाता हुआ मोटा लिंग मेरी योनि द्वार को चीरता हुआ घचाक से पूरा का पूरा अन्दर घुस गया। मेरे मुँह से एक जोरों की चीख फूट पड़ी जिस पर मैंने तुरंत ही काबू पा लिया। झंडे ने भी लिंग के अन्दर घुसते ही तेजी पकड़ ली। वह बड़े जोरदार धक्के मार-मार कर मेरी चूत फाड़े डाल रहा था। हालांकि मेरी अछूती योनि का उदघाटन आज पहली बार झंडे ने किया था। इसलिए योनि की झिल्ली के फट जाने की वजह से मेरी योनि से काफी खून भी निकला था परन्तु वह सारा दर्द मैं सहन कर गई थी, क्योकि आज झंडे के संसर्ग से मुझे आसमान की उंचाईयों को छूने का अवसर जो मिल गया था। ख़ुशी के मारे मेरी हिलकियां फूट पड़ीं और मैं लाज, हया, शर्म छोड़ कर जोरों से चीखने-चिल्लाने लगी,” बेटा तेज करो इन धक्कों को…आह..आज निचोड़ डाल मुझे नीबू की तरह। फाड़ दे मेरी चूत…मेरी बुर में वर्षों से आग लगी है मेरे लाल, मिटा दे इसकी भूख..। झंडे बेटा, मैं पिछले छः सालों से किसी मर्द के लंड की भूखी हूँ। आज तेरा लंड पाकर तेरी चाची धन्य हो गई…..”

इस प्रकार हम दोनों ने छक कर यौन-सुख का लाभ उठाया। उस रात तो झंडे ने मेरी जम कर चुदाई कर डाली और मैं उसका मोटा लंड पाकर निहाल हो गई।

उस समय तो झंडे ने मुझसे कुछ भी नहीं कहा। पर बाद में उसने कहा,”चाची तुम्हें याद है कि मैं और ठन्डे हर चीज को मिल-बाँट कर ही खाते हैं।”

“हाँ, जानती हूँ। तो क्या वह भी मेरी चूत का मज़ा लेगा..?”

झंडे ने खुशामद भरे अंदाज में कहा,”चाची प्लीज, मना मत करना, तुम्हें मेरी कसम…”

“अच्छा जा, वह भी चलेगा। चल जगा दे उसे भी….”

मैं अब दोनों भतीजों को पाकर अपने भाग्य पर इठलाने लगी थी…और अब भी इन दोनों पर मुझे पूरा नाज है, बहू। अब तू जो चाहे मुझे कह ले..रंडी कह या सासू माँ, या चाची कह कर पुकार…मैंने तो जो सचाई थी तेरे सामने रख दी। एक रिश्ते से तो मैं तेरी सास ही हुई और दूसरे रिश्ते से तेरी सौत भी हुई। तू जो रिश्ता मेरे साथ निभाना चाहे तू निभा सकती है….”

चाची के मुँह से सारी सचाई जानकर दुल्हन के मन को बड़ी तसल्ली हुई। उसने आगे बढ़कर अपनी सासू माँ के पैर छू लिए और उनके गले से लग कर रोने लगी।

एक रोज दुल्हन यूँ ही पूछ बैठी,”चाची जी, आपकी चुदाई का खेल क्या चाचा जी को मालूम है? उन्हें पता है कि उनके प्यारे भतीजे उन्हीं की पत्नी को चोदते हैं….”

चाची ने स्वीकृति से सिर हिलाते हुए कहा,”हाँ बहू, तेरे चाचा जी सब जानते हैं। उन्होंने मुझे कई बार झंडे, ठन्डे के साथ ये सब काम करने के लिए खुद ही सलाह दी थी। उनका कहना है कि इससे घर की बात घर में ही दबी रहेगी। कभी-कभी तो वह भी हमारा ये सेक्स गेम काफी-काफी देर तक बैठ कर देखते रहे हैं।

समाप्त



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